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छत्तीसगढ़: अलगाव की राजनीति की नई प्रयोगशाला

01 May-2021

कांग्रेस पार्टी ने शुरुआत से ही देश के विभिन्न हिस्सों में समाज में अलगाव की भावना पैदा कर अपनी राजनीति की है। यदि हम उत्तर भारत की बात करें तो वहां कांग्रेस पार्टी ने जम्मू कश्मीर में अलगाववादियों और आतंकी समर्थकों को बढ़ावा दिया। पंजाब में खालिस्तानीयों को पैर पसारने का मौका भी कांग्रेस ने ही दिया।

उत्तर प्रदेश और बिहार में जमकर समाजवाद, मंडल और जातिवाद की राजनीति की गई। सामाजिक न्याय के नाम पर समाज के विभिन्न तबकों और जातियों को एक दूसरे से लड़ा कर वोट बटोरने का काम कांग्रेस और उसके सहयोगी पार्टियों ने किया।

इसके बाद कांग्रेस ने उत्तर पूर्व के राज्य में धर्म परिवर्तन करा चुके जनजातीय नेतृत्व कर्ताओं के हाथों में सत्ता और संगठन सौंप दिया जिसके बाद लगातार इन क्षेत्रों में गैर ईसाई जनजातियों के साथ ज्यादती की गई। मिजोरम से तो ब्रू-रियांग जनजाति की पूरी जनसंख्या को ही राज्य से बाहर निकाल दिया गया।

पश्चिम बंगाल में भी जिस तरह की राजनीति कांग्रेस ने कि वह सभी के सामने हैं। दक्षिण भारत में हिंदी-हिंदू और उत्तर भारत विरोधी साथ ही द्रविडियन राजनीति कांग्रेस ने ही शुरू की।

मध्य भारत, छत्तीसगढ़ और झारखंड के क्षेत्रों में कांग्रेस ने जनजातियों को गैर जनजातियों से अलग करने के लिए तमाम हथकंडे अपनाए। वोट की राजनीति करते करते वह यह नहीं समझ पाए कि इस समाज पर इस अलगाव की राजनीति के क्या दुष्परिणाम निकलेंगे।

छत्तीसगढ़ में वर्ष 2018 के दिसंबर में हुए विधानसभा चुनाव में कांग्रेस पार्टी को भारी जीत हासिल हुई। इस जीत के बाद 15 वर्षों के बाद इस जनजातीय बहुल राज्य में कांग्रेस की वापसी हुई। सत्ता में आने के बाद से ही कांग्रेस पार्टी ने जिन नीतियों का सहारा लिया वह पूरी तरह समाज को बांटने और अलग करने की ओर प्रदर्शित करता है।

हाल ही में कोरोनावायरस महामारी से बचने के लिए चल रहे टीकाकरण में भी कांग्रेस पार्टी ने एक ऐसी ओछी राजनीति की है कि जिससे बड़े बड़े राजनीतिज्ञ शर्मा जाए। प्रदेश की भूपेश बघेल सरकार ने यहां सामाजिक आर्थिक रूप से पिछड़े लोगों को पहले वैक्सीन देने का निर्णय लिया है।

यह निर्णय किस आधार पर लिया है इसके पीछे किस डाटा का इस्तेमाल किया गया है या ऐसे कौन से गणितीय समीकरण लगाए गए हैं इसके बारे में कोई जानकारी नहीं मिली है। हां लेकिन यह बात स्पष्ट रूप से निकलकर सामने आई है कि यहां राजनीति से प्रेरित है और समाज को बांटने के लिए इसे फिर से छत्तीसगढ़ में किया जा रहा है।

क्या वायरस किसी जाति पंथ समाज और पैसे को देखकर आ रहा है? क्या वायरस से अमीर लोग नहीं मर रहे हैं? जो मध्यमवर्गीय परिवार टैक्स देकर अपनी रोजी-रोटी चलाता है क्या उन्हें वायरस संक्रमित नहीं कर रहा है? तो फिर ऐसी बांटने की राजनीति करने कि आखिर क्या आवश्यकता है?

इससे पहले भी वर्ष 2019 में कांग्रेस पार्टी की सरकार के द्वारा छत्तीसगढ़ में 72% आरक्षण लाने का प्रावधान किया जा रहा था। हाईकोर्ट ने कड़ी फटकार लगाते हुए सरकार के इस फैसले को पूरी तरह रद्द कर दिया।

प्रदेश के ओबीसी वर्ग को साधने के लिए मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने इस रणनीति को अंजाम दिया था। मुख्यमंत्री स्वयं ओबीसी वर्ग से आते हैं और उन्होंने राज्य में कई दफे पिछड़ा वर्ग और सामाजिक रुप से पिछड़े हिस्से  को साधने के लिए तरह-तरह के हथकंडे अपनाए हैं।

छत्तीसगढ़ में बार बार देखा जा रहा है कि पूरे समाज को बार-बार बांटने की कोशिश की जा रही है। वर्तमान सरकार अपनी नीतियों के माध्यम से इसे अंजाम दे रही है। वर्तमान मुख्यमंत्री के पिता खुले मंच से बार-बार सामान्य वर्ग के लोगों के प्रति अपनी घृणा जाहिर कर चुके हैं। इसके अलावा मुख्यमंत्री के पिता ने भगवान श्रीराम पर भी आपत्तिजनक टिप्पणी की थी।

जिस तरह से लगातार छत्तीसगढ़ में अलगाव की फसल बोई जा रही है, उसके बीज लगातार डाले जा रहे हैं और अपने बयानों और नीतियों से उसको सींचा जा रहा है, ऐसा प्रतीत होता है कि आने वाले समय में यहां पर अलगाव की फसल काटने की तैयारी भी की जा सकती है, और इसके परिणाम ना सिर्फ प्रदेश के लिए बल्कि पूरे देश के लिए बेहद चिंताजनक और नुकसानदायक होंगे।


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