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G-23 और कांग्रेस मुक्त विकल्प

02 May-2021

आज 2 मई को पूरे देश की नजर पश्चिम बंगाल के चुनाव नतीजों पर है किन्तु कांग्रेस ओर कांग्रेसियों की नजर शेष चार राज्यों के चुनाव परिणामों पर होगी। इन चारों राज्यों असम, केरल, तमिलनाडु और पुडुचेरी में कांग्रेस के लिए सम्भावना है। इन चार राज्यों के चुनाव परिणामों के अनुसार G-23 अपनी रणनीति तय करेगा।

यदि इन चारों राज्यों में नतीजे कांग्रेस के अनुकूल आये तो कांग्रेस में यथा स्थिति रहेगी। गांधी परिवार की जय जयकार होगी एवं G-23 को अपने कदम वापस लेना होंगे, किन्तु यदि परिणाम विपरीत आये तो क्या होगा यह महत्वपूर्ण प्रश्न है।

यद्यपि कांग्रेस में गांधी परिवार की प्रति भक्ति और सत्ता की चाह की जड़ें बहुत गहरी हैं। उपरोक्त चार राज्यों में परिणाम कांग्रेस के प्रतिकूल आते हैं तो भी यदि कांग्रेस शासित तीन राज्यों के मुख्यमंत्री ओर सांसद-गण यदि गांधी शरणम गच्छामि रहे जिसकी पूरी सम्भावना है तो पूरी कांग्रेस गांधी परिवार के पीछे खड़ी नजर आएगी और यदि परिणाम अनुकूल आये तब तो उस श्रेय का हकदार गांधी परिवार होगा ही।

वास्तव में दोनों परिस्थितियों में G-23 के करने के लिए बहुत कुछ नही है। उनके पास दो ही विकल्प रहेंगे। या तो अपने कदम पीछे लेकर पुनः एक बार "गांधी शरणम गच्छामि" हो जाएं और अपने निर्वासन के काल मे चले जायें या X, Y, Z शब्द जोड़कर एक नई कांग्रेस बना लें, और कुछ दिनों की सुर्खियां बटोरकर गुमनामी में खो जाएं। हाँ, इन पांच राज्यों के चुनाव परिणामों के बाद कांग्रेस में बहुत कुछ बदलेगा इसकी संभावना बहुत कम है।

वास्तव में देश को एक मजबूत विपक्ष देने की इच्छा जिन राजनीतिज्ञों में होगी उन्हें जोड़ तोड़ ओर शॉर्टकट की नीति त्यागना होगी। वास्तव में ऐसे लोगों को जनसंघ से लेकर आज की भाजपा की यात्रा का गहन अध्ययन करना चाहिए और उसी अनुरूप मार्ग पर चलना चाहिए।

G-23 इस दृष्टि से बहुत उपयुक्त समूह है। उनके पास दृष्टि है, अनुभव है, पहचान है और असीम क्षमताएँ हैं। बस उनको दो-तीन  महत्वपूर्ण बातें करना होगीं -

1) "तत्काल सत्ता" की चाहत छोड़ना होगी।

2) नया राजनीतिक दल बनाते समय "कांग्रेस" इस नाम का मोह त्यागना होगा।

3) "एक पार्षद भी अपने दम पर नही जीता सकते" इस छवि से मुक्त होना होगा।

जैसे ऊपर कहा गया है जनसंघ से भाजपा की यात्रा में प्रारम्भ में जनसंघ के उम्मीदवार जमानत बचाने के लिए चुनाव लड़ते थे, तथा इसी में खुश हो जाया करते थे। आज उसी जनसंघ की नई अवतार भाजपा केंद्र में ना केवल सत्तारूढ़ है बल्कि अपने प्रभाव क्षेत्र को तेजी से बढ़ाते जा रही है। पश्चिम बंगाल में तो उसने अपनी जड़ें जमा ही ली हैं, इसी तर्ज पर उसका अगला लक्ष्य तमिलनाडु और केरल होगा।

G-23 को इसी तर्ज पर एक लंबी रणनीति के तहत धैर्य पूर्वक एक नई पार्टी को आगे बढ़ाना चाहिए।

G-23 को "कांग्रेस" नाम का मोह भी छोड़ना चाहिए। क्योंकि कांग्रेस शब्द के जुड़ते ही कांग्रेस द्वारा कई ऐतिहासिक भूलों, गलतियों का भारी -भरकम बोझ किसी भी नई कांग्रेस पर भी आ पड़ता है, साथ ही सबसे बड़ी बात वह कांग्रेसी कल्चर से मुक्त नहीं हो पाती है।

भारत विभाजन का दोष, कश्मीर का विलय ओर धारा 370, चीन के प्रति नीति, आपातकाल, ऑपरेशन ब्लू स्टार ओर सिख नरसंहार, मुस्लिम तुष्टिकरण और शाहबानो प्रकरण, भ्रष्टाचार और वामपंथियों को पीछे केदरवाजे से सत्ता का लाभ देकर इतना ताकतवर बनाना की वे इतने उद्दंड हो गए कि सरेआम "देश के टुकड़े होंगे इंशाल्लाह इंशाल्लाह" कहने का दुस्साहस कर गए। आज भी कांग्रेस को वामपंथी चला रहे हैं, यह आम धारणा है। ये सब कांग्रेस नाम पर ही बोझ हैं।

G-23 को यह ध्यान में लेना चाहिए कि नारायण दत्त तिवारी, अर्जुनसिंह, ममता बैनर्जी और शरद पवार आदि ने जो कांग्रेस बनाई उनका क्या हश्र हुआ है। असली नकली कांग्रेस की लड़ाई से मुक्त होकर एक नया राजनीतिक दल G-23 को बनाना चाहिए।

नया नाम, नई विचारधारा और नई कार्य संस्कृति। याद रहे 1978-979  में जनता पार्टी में दोहरी सदस्यता के विवाद के पश्चात जनसंघ घटक ने जनता पार्टी से अलग होकर भारतीय जनता पार्टी के नाम से नया दल बनाया, जनसंघ को पुनर्जीवित नही किया। यधपि भाजपा ने जनसंघ की विरासत के साथ आज भी जोड़कर रखा है।

वास्तव में आज कांग्रेस ऐसा भवन है जिसकी विशालता तो है किंतु नींव से लेकर शिखर तक इतनी जर्जर हो चुकी है कि उसका पुनर्निर्माण (रिनोवेशन) नही हो सकता नव निर्माण ही करना होगा।

G-23 के लिए कांग्रेस में अब बहुत कुछ बचा नही है।उन्हें येन केन प्रकारेण गुमनामी के जंगल मे खोना है। हाँ, यदि वे इतिहास में अपना नाम दर्ज करवाना चाहते हैं तो उन्हें एक नए दल का गठन करना चाहिए और उसे धैर्य पूर्वक विकसित करना चाहिए।

प्रारम्भ कुछ पंच, सरपंच, पार्षद, विधायकों के जीतने से होगा, धीरे धीरे यह सफलता बढ़ती जाएगी। एक लंबे समय तक लालकृष्ण आडवाणी केवल भाजपा संगठन के नेता थे बाद में वे एक मजबूत जन नेता के रूप में उभरे।

G-23 में बहुत लोगों में जन नेता बनने की क्षमता है।इस प्रकार यह नया दल मजबूत विपक्ष से भविष्य का सत्तारूढ़ दल भी हो सकता है। शुरुआत अच्छी हुई तो बहुत सारे गैर कांग्रेसी नेता भी इस में शामिल हो सकते हैं ओर कांग्रेस से निराश किन्तु भाजपा से असहमत बहुत बड़ा जनसमुदाय इसे अपना समर्थन दे सकता है, बस यह दल हर दृष्टि से कांग्रेस मुक्त हो यह पहली और आखरी शर्त है।

G-23 के पक्ष में सबसे महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि वे 23 हैं।वे अकेले नारायणदत्त तिवारी, अर्जुनसिंह, शरद पवार या ममता दीदी नही है। ना ही वे किसी एक प्रांत, भाषा या जाति से हैं। G-23 देश के बहुत बड़े भूभाग का सांकेतिक प्रतिनिधित्व करता है। यही उनकी ताकत है। वे अपनी इस ताकत को पहचाने तथा भारत के भविष्य को गढ़ने में अपना योगदान देवें।

लेख 

विवेक सक्सेना
विश्लेषक


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