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ममता बनर्जी की जीत के पीछे मुस्लिम वोट, आधे से ज्यादा जीती हुई सीटे मुस्लिम बाहुल्य क्षेत्रों की

03 May-2021

जहाँ एक ओर देश कोरोना महामारी से लड़ रहा है लोग बेबस और लाचार है तो वही दूसरी ओर दीदी अपने प्रचंड जीत की खुशी में मग्न है। हालांकि अब समझने और सोचने वाली बात यह है की पश्चिम बंगाल के चुनाव में टीएमसी के इस एकतरफा जीत के पीछे का राज क्या है।

क्या दीदी के ब्लाइंड फैन बंगाल में आंखे मूंदे समर्थन कर रहे है या फिर दीदी ने दूसरा कोई मुख्य फैक्टर अपनी ओर कर रखा है। मुख्य कारण यह है कि पूरे बंगाल में दीदी सबसे ज्यादा प्यार मुस्लिमों पर लुटाती है। उनका अपना एक विशेष धर्म के लोगो के प्रति या यूं कहें कि खास झुकाव मुस्लिम समुदाय के लोगो के साथ ही है।

आइए कुछ महत्वपूर्ण बिंदुओं के माध्यम से यह समझते है कि मुस्लिम फैक्टर का सीधा फायदा इस बार के विधानसभा चुनावों में दीदी को कैसे मिला। 

पूरे भारत में दूसरे नंबर पर है 27%आबादी वाला मुस्लिम राज्य बंगाल

जी हाँ पश्चिम बंगाल पूरे देश मे 2 नंबर पर 27 प्रतिशत मुस्लिम आबादी वाला राज्य है। 2011 के जनगणना के अनुसार पूरे पश्चिम बंगाल की कुल आबादी लगभग 9.03 करोड़ के लगभग थी अब तक अनुमानित 10 करोड़ के पार  मानी जा रही है।

ऐसे में इस कुल आबादी का 27% हिस्सा 2011 की जनगणना के अनुसार मुस्लिमो का है। अब समझने वाली बात यह है की इस 27% हिस्सा वाले राज्य जो बढ़कर लगभग अब तक 30% के आसपास पहुँच चुका होगा।

दीदी के टीएमसी की जीत ज्यादातर उन विधानसभा सीटों पर हुई है जहाँ मुस्लिमो का बोल-बाला अधिक है। दीदी ने मुस्लिम कार्ड का उपयोग बिल्कुल सही और सोची समझी रणनीति के आधार पर खेला है। 

जीत वाली ज्यादातर सीटों में मुस्लिम जनसंख्या 30% के पार, 46 सीटों पर तो 50% प्रतिशत से भी अधिक 

ममता की जीत को जनता जिस प्रकार से प्रचंड जीत समझकर ज्यादा समझने से इतर सिर्फ निर्णयों पर विश्वास कर रही है तो वही दूसरी और दीदी ने मुस्लिम समुदाय का भरपूर उपयोग अपने मुख्यमंत्री की ताजपोशी के लिए किया है।

पश्चिम बंगाल में टीएमसी के जीत वाली सीटों में कुल 46 सीटों पर 50% मुस्लिम समुदाय के लोग निवास करते है और कही-कही इससे अधिक भी वोट मुस्लिमो के है। गौर करने वाली बात ये भी है कि इन विधानसभा क्षेत्रो में ज्यादातर टीएमसी के उम्मीदवार बड़े जीत के अंतर से विजयी भी हुए है।

लगभग 16 सीटों पर 40 से 50% मुस्लिम मतदाता हैं और यहाँ के भी इन 16 सीटों पर टीएमसी के उम्मीदवारों ने संतोषजनक जीत हासिल की है।

इसके बाद लगातार 33 सीटों पर 30 से 40 प्रतिशत, 50 सीटों पर 20-30% मुस्लिम मतदाताओं का कब्जा है और इन सभी सीटों पर टीएमसी के उम्मीदवार ने अपनी जीत पक्की की है।

मुस्लिम ध्रुवीकरण और वोटबैंक की राजनीति

भारत की राजनीति में हमेशा से देखा गया है कि मुस्लिम वोट बैंक पूरी तरह से ध्रुवीकृत होकर एकमुश्त वोट डालता है। बंगाल का यह चुनाव भी उसी ध्रुवीकरण की जमीन पर लड़ा गया है। लेकिन यदि इसे देश के वामपंथी और बुद्धिजीवी पत्रकारों के नजरिए से देखें तो यह ध्रुवीकरण सांप्रदायिक नहीं बल्कि सेक्युलर है।

आंकड़े और तथ्य कभी झूठ नहीं कहते। देश में जिस जगह मुस्लिम आबादी 30% या 40% से अधिक होती है वहां पर किसी भी हिंदू हित की बात करने वाले पार्टी के कार्यकर्ता या चुनाव लड़ने वाले व्यक्ति के जीतने की संभावना नगण्य हो जाती है।

वहीं दूसरी ओर जिस जगह 15 से 30% तक भी यदि मुस्लिम आबादी है तो वह आबादी एकमुश्त होकर किसी ऐसे पार्टी को वोट करती है जो भाजपा के खिलाफ चुनाव लड़ रहा हो। इसमें कांग्रेस समेत तमाम वह क्षेत्रीय पार्टियां हैं जो भाजपा के खिलाफ देश के विभिन्न राज्य में चुनाव लड़ती है।

इसका उदाहरण हमने देश के कई हिस्सों में देखा है। यदि हम 2019 लोकसभा चुनाव की बात करें तो बिहार के 40 सीटों में से 39 सीट एनडीए गठबंधन ने जीती थी और जीत एक सीट पर भाजपा नीत एनडीए गठबंधन की हार हुई थी वह सिर्फ मुस्लिम बाहुल्य सीट थी।

ऐसा नहीं है कि इस सीट से किसी हिंदूवादी नेता को टिकट दिया गया था बल्कि इस सीट से वर्तमान में जम्मू और कश्मीर के उपराज्यपाल एवं पूर्व केंद्रीय रेल राज्य मंत्री मनोज सिन्हा को भाजपा की तरफ से उम्मीदवार बनाया गया था। बिहार के किशनगंज सीट में हुए इस चुनाव में आईआईटियन मनोज सिन्हा हार गए और जीत मिली अफजाल अंसारी को जो कि बिहार के कुख्यात माफिया डॉन मुख्तार अंसारी का भाई है।

इसके अलावा मुस्लिम मतदाताओं के द्वारा दिए जा रहे हैं वोट में यह भी देखा गया है कि भाजपा को हराने के लिए यदि अलग-अलग पार्टियां लगी हो तो मुस्लिम मतदाता पूरे समाज के साथ एकमुश्त उसी पार्टी को वोट देता है जिसके जीतने की संभावनाएं अधिक हो।

इसका सबसे बड़ा उदाहरण बंगाल में हुए चुनाव के परिणामों में ही देखा जा सकता है। हम पश्चिम बंगाल के चुनाव के परिणाम पर बात करेंगे ही लेकिन इसी मामले में एक और उदाहरण बीते वर्ष दिल्ली में हुए चुनाव में भी देखा गया।

दिल्ली में जब चुनाव होने थे उस दौरान दिल्ली में शाहीन बाग के नाम से हिंदू विरोधी आंदोलन बड़े स्तर पर चलाया गया था। इस आंदोलन के दौरान दिल्ली में वोटों के ध्रुवीकरण होने की गुंजाइश थी जिसे आम आदमी पार्टी ने जमकर भुनाया। मुख्य रूप से दिल्ली में भाजपा, आम आदमी पार्टी और कांग्रेस चुनाव लड़ रही थी। और जब परिणाम सामने आए तो सभी विश्लेषकों ने यही कहा कि मुस्लिम समुदाय का वोट आम आदमी पार्टी को एकतरफा रूप से गया है।

यही स्थिति वर्तमान में पश्चिम बंगाल में देखी गई। पश्चिम बंगाल में लेफ्ट, कांग्रेस और मुस्लिम मौलाना की इंडियन सेक्यूलर फ्रंट के गठबंधन को एक भी सीट हासिल नहीं हुई है। इसके अलावा मुस्लिम समाज की पैरवी करने वाले ओवैसी की पार्टी भी सफलता हासिल नहीं कर पाई। जबकि देखा जाए तो बंगाल में लगभग ढाई करोड़ मुसलमान रहते हैं।

मुस्लिम समाज में यह स्पष्ट संदेश गया था कि उनका वोट नहीं बंटना चाहिए और एकमुश्त तरीके से टीएमसी को उनका वोट जाना चाहिए। इसके अलावा टीएमसी की मुखिया ममता बनर्जी ने भी मुसलमानों से वोट नहीं बांटने की अपील की थी।

यदि कांग्रेस एवं लेफ्ट के गठबंधन के द्वारा मुस्लिम वोट हासिल किया जाता तो संभव था कि टीएमसी को जिन मुस्लिम बाहुल्य क्षेत्रों में बढ़त हासिल हुई वहां वोट प्रतिशत और सीटों की संख्या में कमी हो सकती थी।

वर्ष 2006 से पहले तक मुस्लिम समुदाय के वोट अधिकतर लेफ्ट पार्टी को जाते थे। वर्ष 2006 के चुनाव में भी 45% वोट लेफ्ट पार्टी को गए थे वहीं 25% वोट कांग्रेस के खाते में थे। ममता बनर्जी को उस चुनाव में 22% मुस्लिमों ने वोट दिया था। लेकिन वर्ष 2014 के लोकसभा चुनाव के बाद से मुस्लिमों का झुकाव ममता बनर्जी की पार्टी की ओर ज्यादा हो गया।

2014 के लोकसभा चुनाव एवं 2016 के विधानसभा चुनाव में ममता बनर्जी की पार्टी में क्रमश 40% एवं 51% मुस्लिम मत हासिल की है। लेकिन 2019 के लोकसभा चुनाव में यह मत प्रतिशत बढ़कर 70% तक जा पहुंचा और इस चुनाव में कांग्रेस को मुस्लिम मतदाताओं के 12% लेफ्ट को 10% मत प्राप्त हुए और भाजपा को 5% से भी कम वोट हासिल हुए।

बीते 2 विधानसभा चुनाव की यदि बात करें तो ममता बनर्जी की पार्टी ने मुस्लिम मतदाताओं के द्वारा निर्णायक सीटों पर 54% सीटों पर जीत हासिल की है वहीं भाजपा को एक भी सीटों पर जीत नहीं मिली है।

ममता बनर्जी बंगाल के इमामों को राज्य के पैसे से मुफ्त में तनख्वाह बांटती है। राज्य में मुस्लिम नागरिकों के लिए आरक्षण की बात भी करती है। यही कारण है कि हिंदू समाज को बांट कर और मुस्लिम मतदाताओं को एक कर इस राजनीति को इस तरह से अंजाम दिया जाता है कि जब चुनाव का मौका है तो पूरी तरह से एकमुश्त होकर मुस्लिम समाज ऐसी पार्टी को वोट करें जो हिंदू हित की बात ना करता हो।

डासना के मंदिर के महंत स्वामी यति नरसिंहानंद जी ने कुछ समय पहले कहा था कि वर्ष 2029 के चुनाव में भारत का प्रधानमंत्री एक मुसलमान होगा और इसकी वजह उन्होंने देश में बदलती डेमोग्राफी को बताया था। हो सकता है या अतिरेक हो या हो भी सकता है कि ऐसा ना हो लेकिन जिस तरह के आंकड़े हमारे सामने राज्य दर राज्य सामने आ रहे हैं उससे यही प्रतीत होता है कि ऐसा होना असंभव नहीं है।

बंगाल की अस्मीयता पर महिलाओं का साथ होने पर दीदी की जीत यह बिल्कुल झूठ

ज्यादातर ऐसी खबरों को हवा मिल रही है कि दीदी के इस प्रचंड जीत का राज बंगाल की अस्मीयता और महिलाओं का सम्पूर्ण साथ है और कई खबरे जो सुर्खिया बटोर रही है कि मुस्लिम मतदाता वाला फैक्टर इस बार के बंगाल चुनाव में नही चला मगर यह बिल्कुल सच नही है।

आकड़ो और मतदाता प्रतिशत पर अगर गम्भीरता से नजर जाए तो आंखे खुली रह जाएंगी। ज्यादातर लोगों को ये लगा कि इस बार का पश्चिम बंगाल चुनाव किसी धर्म विशेष के माध्यम से नही लड़ा जाएगा मगर इन सब से इतर दीदी की रणनीति ने उनकी तीसरी बार सत्ता तय कर दी और बंगाल की जनता को पता भी नही लगा कि मुस्लिम समुदाय के लोगो की ही चुनी गई सरकार बंगाल में फिरसे आयी है। 

नंदीग्राम से ममता पर नही बरसी "ममता" बावजूद इसके कोर्ट जाने की कही बात

देश मे सबसे अधिक चर्चा में चल रही हाई प्रोफाइल सीट नंदीग्राम से ममता बैनर्जी खुद सुवेन्दु अधिकारी से हार गई। सुवेन्दु के टीएमसी छोड़ने से नाराज होकर दीदी ने अफरा तफरी मे सुवेन्दु को पटखनी देने के लिए नंदीग्राम सीट को खुद के लिए चुना था।

उन्हें ऐसा लगता था कि अधिकारी परिवार का नन्दीग्राम में इतनी तगड़ी पकड़ होने के बावजूद दीदी सुवेन्दु को हरा देंगी मगर ऐसा हुआ नही। सुवेन्दु ने बंगाल की पूर्व मुख्यमंत्री को मतगणना शुरू होने के तुरंत बाद से ही कड़ी टक्कर देना शुरू कर दिया था।

ममता चुनिंदा राउंड में ही सुभेन्दु से आगे चल पाई और काफी कम वोटों से लीड ले पा रही थी। फिर 17 वे राउंड की गिनती के बाद 1200 वोटों से दीदी के जीत की खबरे उड़ने लगी और पूरे देश मे ममता के नंदीग्राम पर फतेह की बात होने लगी। मगर कुल 19 राउंड तक नंदीग्राम सीट की मतगणना हुई और सुभेन्दु अंत मे 1958 वोटों से विजयी हुए।

बावजूद सब कुछ ऑफिसियल होने के बाद भी दीदी ने कोर्ट में नंदीग्राम सीट के परिणाम को चुनौती देने की बात कह डाली है। ऐसा माना जा रहा है कि टीएमसी के अराजक तत्वों द्वारा नन्दीग्राम में भाजपा की जीत के बाद सुवेन्दु अधिकारी के गाड़ी पर पथराव कर हिंसक गतिविधियों को अंजाम दिया।

लेख


ऋषभ तिवारी (विवान)
सब-एडिटर, द नैरेटिव
माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविद्यालय के पूर्व छात्र
राष्ट्रीय स्तर पर होने वाले सम सामयिक मुद्दों पर, देश में घटने वालो राजनीतिक मुद्दों पर, चुनावी मुद्दों पर और खास तौर पर उभरे अनोखे मुद्दों पर लेख लिखने में खास रुचि रखते है


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