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ऋग्वेद में है संवत्सर का उल्लेख

13 Apr-2021

कोविड-19 की विषम परिस्थिति में आज भारतीय पंचांग के अनुसार नए संवत्सर (वर्ष) का आरंभ है। यह और बात है की देश में अभी भी आम प्रचलन में ग्रेगेरियन कैलेंडर है जिसका आरंभ 1 जनवरी से होता है, इस नववर्ष के स्वागत में 31 दिसंबर की रात गुलज़ार रहती है। लोग बीते वर्ष की विदाई और नए वर्ष के स्वागत के नाम पर नाच, गाना करते हैं।

इसे विडंबना ही कहें कि आज की पीढ़ी को अपने देशज नए साल की न तो जानकारी है और न ही उसके स्वागत का उत्साह। इसका दोष किसे दें? वे सभी दोषी हैं जिन्होंने भारतीय पंचांग की प्राचीनता और विशेषता के संबंध में आने वाली पीढ़ियों को जानकारी नहीं दी । जबकि भारतीय कैलेंडर का उल्लेख ऋग्वेद में मिलता है।

दुनिया का प्राचीनतम ग्रन्थ है ऋग्वेद, आधुनिक इतिहासकार इस ग्रंथ की रचना आज से 4000 वर्ष पूर्व हुई है मानते हैं, जबकि इसकी तिथि नए शोध के अनुसार 10000 वर्ष से पूर्व की है। इस समय दुनिया के लोग सभ्यता से दूर यायावरी जीवन जी रहे थे तब ऋग्वेद की रचना करने वाले ऋषि मुनियों ने इस ग्रंथ में भारतीय कैलेंडर का उल्लेख किया है, जिसमें 360 दिन होते थे जो 12 महीनों में विभाजित थे।

ऋग्वेद के पहले मंडल के 164 वें सूक्त की 11वीं ऋचा से 48वीं ऋचा तक सूर्य पृथ्वी के बीच के खगोलीय संबंध का उल्लेख है। इसमें पृथ्वी के द्वारा सूर्य के चक्कर लगाने का उल्लेख है, जो 12 महीनों में 360 दिनों में एक चक्कर लगाता है।

11वीं ऋचा के अनुसार, 
द्वादशारं नहि तज्जराय वर्ति चक्रं परि द्यामृतस्य । 
आ पुत्रा अग्ने मिथुनासो अत्र सप्त शतानि विंशतिश्च तस्थुःll 

वेदाचार्य सायन के भाष्य के अनुसार हिंदी में अर्थ है, सत्यात्मक आदित्य का मण्डलाख्य रथचक्र बार-बार बार धुलोक के चारों ओर घूमता रहता है जो द्वादश संख्यात्मक मेषादि राशियों या महीनों रूपी अरों से युक्त है तथा वह चक्र कभी जीर्ण नहीं होता । हे अग्ने ! या हे सर्वदा गमनयुक्त आदित्य ! आपके इस चक्र में स्त्री पुरुष रूप में मिथुनभूत सात सौ बीस पुत्रवत् अहोरात निवास करते हैं । 

उपरोक्त व्याख्या में दिन और रात को पुरुष और स्त्री कहा गया है, मतलब 24 घंटे में दो कालखंड, साल में 720। इसका विस्तार से अर्थ निम्न शब्दार्थ में इस प्रकार है - 
द्वादश अरम् - बारह मास बारह राशि रूप अरों वाले,; वर्वर्ति - घूमता रहता है ; ऋतस्य - सत्यरूप आदित्य के पुत्रा : -प्राणियों को पुत्रवत् दुःख से छुड़ाने वाले अहोरात्र ; सप्तशतानि विंशतिः च – सात सौ बीस , " सप्त च वै शतानि विंशतिश्च संवत्सरस्याहोरात्राः स एषोऽह : समानः ' ' ( ऐ . आ . ३.२.१ ) रात्रि और दिवस , कुल तीन सौ साठ प्रत्येक संवत्सर में।

इस ऋचा में बारह राशियों का उल्लेख है, प्रत्येक माह में पृथ्वी अंतरिक्ष में किसी राशि से होकर गुजरती है। इसी आधार पर किसी जातक की जन्मकुंडली बनाई जाती है। ऋग्वेद में छह ऋतुओं का भी उल्लेख किया गया है, ग्रीष्म, शीत, वर्षा, हेमंत, वसंत, शरद। 12वीं ऋचा है,

पञ्चपादं पितरं द्वादशाकृति दिव आहुः परे अर्धे पुरीषिणम् । 
अथेमे अन्य उपरे विचक्षणं सप्तचक्रे षळर आहुरर्पितम्।।

इसका अर्थ है, पंचसंख्याक ऋत्वात्मक पादों से युक्त (हेमन्त और शिशिर को एक मानकर) तथा सबके आह्लादक या पालक और बारह मास रूपी आकृतियों से युक्त और जल से युक्त संवत्सर - चक्र, धुलोक के दूसरे आधे भाग या अन्तरिक्ष आदित्यरूप से स्थित है। लोग संवत्सर को सूर्यायत्त कहते हैं। दूसरे वेद - वादी सात रश्मिरूप चक्रों वाले तथा छ : ऋतु जिसकी नाभि में अरे की तरह स्थित हैं, उस संवत्सर रथ में, विविध दर्शन युक्त आदित्य को चढ़ा हुआ मानते हैं। 

इसमें सूर्य की सात रश्मियों का उल्लेख है जो प्रकाश के सात रंगों की ओर इंगित करता है। इसका मतलब है आज से 10000 दस हजार साल पहले भारत में खगोल शास्त्र और भौतिक विज्ञान का अध्ययन हो रहा था। विचार करें जब भारत में छह ऋतुओं का वर्णन है इसका मतलब तब ऋषि मुनियों को इस बात का ज्ञान था कि सूर्य और पृथ्वी का एक दूसरे के चारों ओर घूमने के साथ पृथ्वी या सूर्य का अपने अक्ष में साढ़े तेईस डिग्री का झुकाव है। इससे ही तो मौसम बदलते हैं। एक अन्य ऋचा में भी नव संवत्सर का उल्लेख मिलता है, 

 द्वादश प्रधयश्चक्रमेकं त्रीणि नभ्यानि क उ तच्चिकेत ।
 तस्मिन्त्साकं त्रिशता न शङ्कवोऽर्पिताः षष्टिर्न चलाचलासः।।८ ।।

 द्वादशसंख्याक परिधियाँ ( द्वादश मास ) संवत्सर रूपी एक चक्र में आश्रित हैं तथा त्रिसंख्याक नाभ्याश्रय फलक ( ग्रीष्म , वर्षा , हेमन्त ) उसमें आश्रित हैं । कोई महान् ही उस चक्र को जानता है । उस चक्र में साथ ही , शंकु ( खुंटी ) की भाँति ३६० अरे लगे हैं जो निरन्तर चलन स्वभाव वाले हैं।

 

लेख

श्री शशांक शर्मा

वरिष्ठ पत्रकार


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