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जिस पत्रकारिता की वामपंथियों ने हत्या की अब उसे चिता पर रखने के लिए श्मशान से रिपोर्टिंग की जा रही हैं

29 Apr-2021

हमने इस देश में हर तरह की पत्रकारिता देखी है। वामपंथी पत्रकारों का तो पूरा एक जमात ही है जिन्होंने वर्षों तक अपने हिसाब से देश का विमर्श सेट किया। राडिया टेप से लेकर पालतू मीडिया तक हमने सब कुछ देखा है। लेकिन वर्तमान दौर में महामारी के इस भीषण आपदा के समय कुछ लोगों के द्वारा जो स्वयं को पत्रकार कहते हैं केवल एक व्यक्ति के विरोध करने के चक्कर में ऐसी घृणित पत्रकारिता को अंजाम दे रहे हैं जिसे ना ही पत्रकारिता कहा जा सकता है और ना ही ऐसे लोगों को पत्रकार कहा जा सकता है।

दानिश सिद्दीकी के द्वारा खींची गई शमशान की वह तस्वीर जिसमें ढेरों संख्या में शव को श्मशान में अग्नि संस्कार के क्रिया में लगाया जा रहा है ऐसे समय में ऐसी तस्वीर को खींचकर सनसनी फैलाने का काम इन पत्रकारों ने किया है।

इसके अलावा बरखा दत्त जैसी कुख्यात पत्रकार ने शमशान से ही अपना स्टूडियो बना लिया और वही बैठकर रिपोर्टिंग करने लगी। 

हमने एक तस्वीर को देखा है जिसमें एक अफ्रीकी बालक दम तोड़ते हुए दिखाई देता है जिसके मरने का इंतजार एक गिद्ध कर रहा होता है। कुछ इसी तरह गिद्ध रूपी पत्रकार अब शमशान में जाकर बैठ गए हैं।

टीवी स्टूडियो से चलकर न्यूज़ दिखाने वाले लोग अब शमशान मैं बैठकर रिपोर्टिंग कर रहे हैं। क्या यह है इस देश के पत्रकारों की संवेदनशीलता? क्या यह पत्रकार कहलाने लायक भी है?

इसके अलावा एक अन्य पूर्व पत्रकार विनोद कापड़ी जो कि अपने उल जलूल टीवी प्रोग्राम की वजह से जाना जाता था वह भी अब शमशान की पत्रकारिता कर रहा है। इसने तो एक कदम आगे बढ़कर अपने द्वारा रिकॉर्ड किए गए वीडियो और तस्वीरों में वाटर मार्क लगाना शुरू कर दिया ताकि कोई बड़ा मीडिया संस्थान इनसे वह शमशान वाली पत्रकारिता की फुटेज खरीद ले।

आखिर यह कैसा असर है पत्रकारिता का जो सनसनीखेज बनने के चक्कर में शमशान की चिताओं तक जा पहुंचा है। इन्हीं वामपंथी पत्रकारों ने पत्रकारिता को तो वर्षों पहले मार डाला था शायद अब यह उसी पत्रकारिता को चिता पर बैठा कर उसके अंतिम संस्कार की प्रक्रिया को पूरा कर रहे हैं।

हिंदू घृणा और एक व्यक्ति के विरोध के चलते इन लोगों ने पत्रकारिता का मतलब केवल लाशों को दिखाना ही समझ लिया है। इन्हें जरा सा भी ख्याल नहीं कि इनकी भयभीत करने वाली पत्रकारिता के चलते देश के कितने लोगों पर मनोवैज्ञानिक रूप से असर पड़ रहा है।

लेकिन सच तो यह है कि इन लोगों ने कभी देश का सोचा ही नहीं। इन लोगों ने केवल अपना अपने विचार का अपने परिवार का ही सोचा है।


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