अप्रैल 2010: भारत में हुआ सबसे बड़ा माओवादी आतंकी हमला, जिसमें 76 जवान हुए बलिदान

पीटीआई की तत्कालीन रिपोर्ट के अनुसार तत्कालीन गृह सचिव रहे जीके पिल्लई ने भी माना था कि इसमें कई गलतियां हुई हैं। उन्होंने कहा था कि कुछ गलतियां हुई हैं, इतनी जाने नहीं जानी चाहिए।

The Narrative World    17-Apr-2023   
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वर्ष 2010, तारीख थी 6 अप्रैल और दिन मंगलवार। सुबह-सुबह पत्रकारों ने हड़बड़ी में ब्रेकिंग न्यूज़ चलाना शुरू किया जिसमें कहा गया कि माओवादियों और सुरक्षाबलों की मुठभेड़ में 5 जवान घायल हुए हैं।


यह सुबह तकरीबन 7 बजे की बात थी। इसके बाद 8 बजे खबर आई कि करीबन छः दर्जन जवान बलिदान हो गए हैं। हालांकि ये सभी खबर सूत्रों के हवाले से दिए जा रहे थे। पुलिस ने इसकी पुष्टि नहीं की थी।


तभी अचानक 9 बजे इस बात की पुष्टि हुई कि यह देश का सबसे बड़ा माओवादी आतंकी हमला था जिसमें कुल 76 जवान वीरगति को प्राप्त हुए। बलिदान होने वाले जवानों में 75 जवान सीआरपीएफ एवं एक जवान जिला पुलिस बल के थे।


यह पूरी घटना सुकमा जिले के ताड़मेटला में हुई थी जो उस दौरान दंतेवाड़ा जिले में आता था।


रायपुर से लेकर दिल्ली तक हलचल मच चुकी थी। 76 जवानों के बलिदान होने की घटना पर यकीन कर पाना सभी के लिए मुश्किल था। देश के सभी बड़े मीडिया समूहों ने इस खबर को प्रमुखता से दिखाने के लिए छत्तीसगढ़ में संपर्क करना शुरू किया।


उस दौरान घटना की रिपोर्टिंग कर रहे कुछ पत्रकार बताते हैं कि उस समय ना तो व्हाट्सएप था और ना ही फ़ास्ट इंटरनेट। इसीलिए पुष्ट खबर मिलने में देरी हो रही थी। पत्रकार बताते हैं कि वो जानना तो चाहते थे कि यह घटना कैसे हुई लेकिन मन के भीतर इतनी बड़ी घटना को लेकर एक बैचेनी भरी हुई थी।



इस हमले को लेकर जांच में यह बात सामने आई थी कि माओवादियों की तलाश में सुरक्षाबल के 81 जवान सर्च अभियान के लिए निकले थे। जवान सर्च अभियान पूरा कर सुबह-सुबह के समय वापसी कर रहे थे।


अभियान के कारण अधिकांश जवान थके हुए थे और इसी का फायदा उठाते हुए तकरीबन 500 से अधिक माओवादियों ने जवानों को घेरकर उनपर हमला बोल दिया।


माओवादियों ने प्रेशर बारूदी सुरंग विस्फोट कर जवानों के वाहन को उड़ा दिया और उसके बाद घात लगाकर माओवादियों ने अंधाधुंध फायरिंग की।


माओवादियों के द्वारा किए गए इस हमले की भयावहता को कुछ इस तरह से समझा जा सकता है कि इस आतंकी हमले में माओवादियों ने सुरक्षाबलों की पूरी कंपनी को उड़ा दिया था। ये सभी जवान सीआरपीएफ के 62वीं बटालियन के थे।


वहीं एक अन्य जवान जिला पुलिस बल से भी था। माओवादियों के हमले का सुरक्षाबलों ने जवाब देने का प्रयास किया। इतनी बड़ी संख्या में हताहत होने के बाद भी 3 घंटे तक यह मुठभेड़ चलती रही।


इस हमले के बाद माओवादियों ने सुरक्षाबलों के हथियार और अन्य सामान भी लूट लिए थे। घटनास्थल से घायलों को बाहर निकालने के लिए हेलीकॉप्टर की सहायता ली गई थी।


केंद्रीय गृह सचिव ने बताया था कि जब घायलों को ले जाने के लिए हेलीकॉप्टर राहत कार्य में जुटे थे तब माओवादी आतंकियों उनपर भी गोलीबारी की थी। इसके अलावा राहत कार्य में लगे एक माइन प्रोटेक्टिव वाहन को भी बारूदी सुरंग से निशाना बनाया गया था।


पीटीआई की तत्कालीन रिपोर्ट के अनुसार तत्कालीन गृह सचिव रहे जीके पिल्लई ने भी माना था कि इसमें कई गलतियां हुई हैं। उन्होंने कहा था कि कुछ गलतियां हुई हैं, इतनी जाने नहीं जानी चाहिए।


इसके अलावा ऐसी रिपोर्ट भी सामने आई थी कि तत्कालीन केंद्र की कांग्रेस सरकार ने माओवादियों से भिड़ने के केंद्रीय सुरक्षाबलों को जंगलो में भेज तो दिया था लेकिन उन्हें पर्याप्त सुरक्षा उपकरण एवं सुविधाएं नहीं दी थी।


ऐसी कुछ रिपोर्ट्स सामने आई थी कि जवानों के पास इस हमले के दौरान माओवादियों से मुकाबला करने के लिए पर्याप्त हथियार नहीं थे।


इस घटना की जांच में यह जानकारी भी सामने आई थी कि माओवादी आतंकी संगठन के दंडकारण्य स्पेशल जोनल कमेटी के आतंकी नेता कोसा, गणेशान्ना और रमन्ना ने इस घटना की योजना बनाई थी।


इस घटना के बाद माओवादियों की ओर से कहा गया था कि यह सुरक्षाबलों द्वारा चलाये जा रहे ऑपरेशन ग्रीन हंट का 'सीधा परिणाम' है।


यह घटना कितनी बड़ी थी इसका अंदाजा इस बात से भी लगाया जा सकता है कि इसके बाद राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद ने आपात बैठक बुलाई थी।


इस बैठक में तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह, गृह मंत्री पी चिदंबरम, वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी, रक्षा मंत्री एके एंटनी, राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार शिवशंकर मेनन, आईबी के डायरेक्टर समेत तीनों सेनाओं के प्रमुख भी शामिल थे।


केंद्रीय गृहमंत्री के निर्देश के बाद सीआरपीएफ डीजी और केंद्रीय गृहमंत्रालय के संयुक्त सचिव को रायपुर भेजा गया और उन्होंने मुख्यमंत्री समेत विभिन्न प्रमुख अधिकारियों से घटना पर चर्चा की।


हालांकि कांग्रेस की सरकार ने इतनी बड़ी घटना के बाद भी माओवादियों के खात्मे के लिए केंद्र स्तर से निर्देश देते हुए कोई व्यापक अभियान नहीं चलाया। इसका नतीजा यह हुआ कि साल-दर-साल माओवादियों ने आतंकी हमलों को अंजाम दिया जिसमें सुरक्षाबल के जवान बलिदान होते गए।