सेनबारी नरसंहार : कम्युनिस्टों ने युवकों की हत्या कर उनकी माँ को 'खून से सना' हुआ चावल खिलाया था

26 Mar 2025 16:43:32
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'द कश्मीर फाइल्स' फिल्म में एक दृश्य दिखाया गया था, जिसमें एक कश्मीरी हिंदू महिला को इस्लामिक जिहादी आतंकियों द्वारा खून से सना हुआ चावल खिलाया जाता है।
 
इस चावल में जो खून था, वह उस महिला के पति का था, जिसे इस्लामिक आतंकियों ने उसके सामने ही मारा था।
 
यह दृश्य एक सच्ची घटना पर आधारित था, जिसमें आतंकियों ने इंजीनियर बी.के. गंजू की हत्या कर दी थी, जब वह अपने घर के भीतर चावल से भरे ट्रंक में छिपे हुए थे।
 
जब उनकी पत्नी को फिल्म में 'खून से सना हुआ चावल' खिलाया जाता है, तब का दृश्य देखकर सभी के रोंगटे खड़े हो गए थे।
 
इसके बाद सभी ने सोचा कि यह इस्लामिक जिहादियों द्वारा की गई ऐसी हैवानियत है, जो कहीं और नहीं देखी जा सकती।
 
लेकिन आप गलत हैं, हम सब गलत हैं। जिस तरह कश्मीर में एक महिला को इस्लामिक जिहादियों ने खून से सना हुआ चावल खिलाया था, ठीक उसी तरह पश्चिम बंगाल में कम्युनिस्टों ने एक महिला को अपने ही बेटों के खून से सना हुआ चावल खिलाया था।
 
और यह घटना कश्मीर की इस घटना से दो दशक पहले घटी थी।
 
आइए जानते हैं, कौन सी वह घटना थी, जिसे कम्युनिस्टों ने इतनी निर्दयता से अंजाम दिया था और केवल वैचारिक मतभेद के कारण हत्याएँ की थीं।
 
पश्चिम बंगाल के बर्धमान जिले में कम्युनिस्टों ने 3 युवकों की निर्ममता से हत्या कर दी थी, जिसके बाद उनके खून को चावल में मिलाकर उनकी माँ को खिलाया गया था।
 
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इस पूरी घटना को भारत के सबसे कुख्यात हत्याकांडों में से एक माना जाता है।
 
दरअसल, 1970 के दौर में बर्धमान में रहने वाला सेन परिवार एक प्रतिष्ठित एवं सामाजिक परिवार था, जिनका तत्कालीन कांग्रेस पार्टी से सीधा संपर्क था।
 
इस दौरान बंगाल के कम्युनिस्ट सभी को जबरन कम्युनिस्ट पार्टी से जोड़ने का दबाव बना रहे थे और प्रदेश के कई हिस्सों में हिंसा, भय एवं आतंक के माध्यम से लोगों को कम्युनिस्ट पार्टी से जोड़ रहे थे।
 
यही रणनीति कम्युनिस्टों ने बर्धमान के सेन परिवार पर भी अपनाई, जिन्हें धमकी एवं भय से वे अपनी पार्टी से जोड़ना चाहते थे।
 
इस बीच, 17 मार्च को सेन परिवार में एक नवजात बच्ची का नामकरण होना था, जिसमें पूरा परिवार आनंदित था।
 
लेकिन दूसरी ओर, कम्युनिस्ट पार्टी के नेता और कार्यकर्ता सेन परिवार पर हमला करने की योजना बना रहे थे, जिसे उन्होंने अंततः अंजाम दे ही दिया।
 
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कम्युनिस्टों की भीड़ ने पहले तो सेन परिवार के घर पर आगजनी की और उसके बाद एक ही परिवार के दो युवकों को इतनी बेरहमी से मारा कि आज भी इस घटना को सुनकर लोगों की रूह काँप जाती है।
 
कम्युनिस्टों का आतंक यहीं नहीं रुका, उन्होंने उनके घर आने वाले ट्यूशन टीचर जितेन्द्रनाथ राय की भी हत्या कर दी।
 
कम्युनिस्टों की घृणा और उनके विचारों के जहर का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि उन्होंने मारे गए बेटों के खून को चावल में मिलाकर उनकी माँ से वहीं पर खिलाया।
 
यह एक ऐसी घटना थी, जिसे सोचते हुए भी रोंगटे खड़े हो जाते हैं।
 
इस पूरी घटना की प्रत्यक्षदर्शी रहीं सेन परिवार की एक महिला बताती हैं कि वे उस समय केवल 26 वर्ष की थीं, जब उनके दोनों देवरों - प्रणब कुमार सेन और मलय कुमार सेन को इन कम्युनिस्टों ने मारा था।
 
उन्होंने इंडियन एक्सप्रेस को दिए अपने इंटरव्यू में बताया था कि जब उनकी सास ने हमलावरों को रोकने का प्रयास किया, तो उन्हें भी सिर पर मारा गया।
 
दो हमलावरों ने दोनों भाइयों के शव से खून निकालकर उसे चावल में मिलाया और उनकी सास के मुँह में डाल दिया।
 
इस बीच, मारे गए युवकों की बहन को भी कम्युनिस्टों ने जबरन खींच लिया और आग में जलाने के लिए फेंक दिया, लेकिन परिजनों ने उनकी जान बचा ली।
 
स्थिति इतनी भयावह थी कि कम्युनिस्टों ने उस नवजात शिशु को भी आग में फेंकने की कोशिश की, जिसके नामकरण का उत्सव उस समय सेन परिवार में मनाया जा रहा था।
 
इस घटना की गवाह बनीं सेन परिवार की महिला रेखा रानी थीं, जिनके पति को भी एक वर्ष बाद मार दिया गया था।
 
वहीं इस घटना का एक अन्य चश्मदीद गुनामोनी रॉय था, जो एनएसयूआई का कार्यकर्ता था और जिसे बाद में कम्युनिस्टों ने मार दिया।
 
इस पूरी घटना को भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) अर्थात सीपीआईएम के नेताओं ने अंजाम दिया था।
 
यह घटना इतनी विभत्स थी कि तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने स्वयं बर्धमान जाकर सेन परिवार से मुलाकात की थी।
 
इस घटना के कारण मृतक युवकों की माता ने अपना मानसिक संतुलन हमेशा के लिए खो दिया था, और वे जीवन के अंत तक उसी स्थिति में रहीं।
 
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वहीं कम्युनिस्ट पार्टी की राजनीतिक नैतिकता का स्तर इससे भी समझा जा सकता है कि जिन कम्युनिस्ट नेताओं को इस घटना का आरोपी माना गया था, उन्हीं को बाद में पार्टी ने मंत्री, सांसद और बड़े पदों पर बिठाया।
 
इसमें कथित तौर पर सीपीआईएम के नेता बिनॉय कोनार, अनिल बसु, निरूपम सेन और अमाल हलधर जैसे कम्युनिस्ट नेताओं के नाम शामिल हैं।
 
यह सेन परिवार केवल इस कारण मारा गया क्योंकि उन्होंने कांग्रेस की विचारधारा को अपनाया था।
“कम्युनिस्टों ने सेन परिवार की महिला को उसके बेटे के खून से सना हुआ चावल इसलिए खिलाया क्योंकि वे कम्युनिस्ट पार्टी से नहीं जुड़ रहे थे।”
 
कम्युनिस्ट पार्टी ने इस घटना से जुड़े हत्यारों को मंत्री और सांसद बनाया क्योंकि उन्होंने कम्युनिज्म के विचार के अनुसार 'क्रांति' की थी।
 
आज कांग्रेस पार्टी इस घटना पर इसलिए चुप्पी साधे हुए है क्योंकि उसने कम्युनिस्टों से हाथ मिला लिया है।
 
लेकिन यह एक ऐसी घटना है, जिस पर चर्चा होनी चाहिए, जिस पर विमर्श खड़ा होना चाहिए।
 
आखिर यह कौन सी विचारधारा है, जिसके कारण केवल कम्युनिस्ट पार्टी में आने से मना करने पर पूरे परिवार को मार डाला गया?
 
अगर देखा जाए, तो यही कम्युनिज्म की सच्चाई है, जो बंगाल में भी दिखती थी, त्रिपुरा में भी दिखती थी, वर्तमान में केरल में भी दिखती है और बस्तर के जंगलों में भी दिखती है।
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