वर्षों तक देश को खून से रंगने वाले माओवादी आखिरकार शांति वार्ता के लिए राजी हो गए हैं।
लेकिन क्या यह वास्तव में एक ईमानदार पहल है, या फिर इनका एक और कुटिल षड्यंत्र? इतिहास इस बात का गवाह है कि जब भी माओवादी वार्ता की बात करते हैं, उसका असली मकसद खुद को संगठित करना, अपनी शक्ति को पुनः मजबूत करना और फिर से आतंक मचाना ही होता है।
माओवादी हताश, लेकिन पूरी तरह पराजित नहीं!
बस्तर और अन्य नक्सल प्रभावित इलाकों में सरकार और सुरक्षा बलों के लगातार अभियान ने माओवादियों की कमर तोड़ दी है।
एक के बाद एक उनके बड़े कमांडर मारे जा रहे हैं, सैकड़ों नक्सली सरेंडर कर रहे हैं और उनकी रणनीतियाँ लगातार विफल हो रही हैं।
इन हालातों में, जब उनका अस्तित्व खतरे में पड़ गया है, तो वे ‘शांति वार्ता’ का झूठा खेल खेलने लगे हैं।
माओवादियों की ओर से जारी कथित पत्र, जिसमें शांति वार्ता की बात कही गई है, दरअसल एक दिखावा है।
इस पत्र में यह दावा किया गया है कि वे बिना शर्त युद्ध विराम को तैयार हैं, लेकिन इसका असली मकसद सरकार और सुरक्षा बलों को गुमराह करना है।
अगर सरकार इनके जाल में फंस गई, तो कुछ ही महीनों बाद ये फिर से अपने खूनी खेल में लौट आएंगे।
शांति वार्ता के नाम पर समय खरीदने की साजिश
इतिहास गवाह है कि जब-जब माओवादियों ने शांति की बात की है, तब-तब उन्होंने केवल खुद को और मजबूत किया है।
2010 में भी जब माओवादियों ने इसी तरह शांति वार्ता की बात की थी, तब सरकार के नरम रुख का फायदा उठाकर उन्होंने खुद को फिर से संगठित किया और बड़े हमलों को अंजाम दिया। 2013 में झीरम घाटी हमले में कांग्रेस के कई बड़े नेताओं की हत्या कर दी गई थी।
इस बार भी स्थिति अलग नहीं है। शांति वार्ता के बहाने माओवादी चाहते हैं कि सरकार उन पर जारी अभियान को रोक दे, जिससे उन्हें हथियार और लड़ाके इकट्ठा करने का समय मिल सके।
माओवादी हिंसा की असली हकीकत
- इनकी विचारधारा केवल हिंसा और आतंक पर आधारित है।
- जनजातियों और ग्रामीणों को ढाल बनाकर ये अपना उल्लू सीधा करते हैं।
- सुरक्षाबलों पर घात लगाकर हमला करना, सरकारी संपत्तियों को नुकसान पहुंचाना, पुलिसकर्मियों की हत्या करना इनका असली चेहरा है।
- जब इनका प्रभाव घटने लगता है, तो ये शांति वार्ता की आड़ में खुद को मजबूत करने का प्रयास करते हैं।
सरकार को सतर्क रहने की जरूरत!
माओवादी पहले भी कई बार इस तरह के छलावे कर चुके हैं। अगर सरकार ने इनकी मांगें मान लीं और सुरक्षा बलों को वापस बुला लिया, तो यह सबसे बड़ी भूल होगी।
यह याद रखना जरूरी है कि माओवादी न कभी देशभक्त थे, न ही कभी शांति चाहते थे। इनका एकमात्र मकसद सत्ता हथियाना और हिंसा के जरिए अपने एजेंडे को लागू करना है।
अगर सरकार को वास्तव में नक्सल समस्या का समाधान करना है, तो उसे इनसे सख्ती से निपटना होगा।
सुरक्षा बलों और पुलिस के अभियानों को तेज किया जाना चाहिए ताकि इनका सफाया किया जा सके।
शांति वार्ता के नाम पर धोखे का यह खेल अब नहीं चलना चाहिए!